Classical waterfall model in hindi , Classical water fall model

वाटरफॉल मॉडल क्या है और कैसे काम करता है?


Classical Waterfall Model in hindi के इस पोस्ट में हम software development  life  cycle  के एक महत्वपूर्ण मॉडल के बारे में जानने वाले है , आशा करते है  पोस्ट आपको निश्चित तौर पर समझ  आएगा 

Software Development Life Cycle का क्लासिक वॉटरफॉल मॉडल बेसिक मॉडल है | इसको उपयोग करना  बहुत ही आसान है लेकिन idealistic(आदर्शवादी) है | प्रारम्भ में यह एक बहुत ही पॉपुलर मॉडल था लेकिन आजकल इसका प्रयोग नहीं किया  किया  जाता है | 
लेकिन ये फिर भी महत्वपूर्ण है , क्या कहा क्लासिक वॉटरफॉल मॉडल महत्वपूर्ण  कैसे है ?  क्योंकि जो अन्य सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट लाइफ साइकिल मोडल है वो सभी क्लासिकल वाटर फाल मॉडल पर आधारित है | 
अब चलिए देखते है ये मॉडल कार्य कैसे करता है =>
क्लासिकल वाटर फॉल मॉडल लाइफ साइकिल को चरणों के सेट (set of  phase ) में बाँट देता है |  क्लासिक वाटरफॉल मॉडल ऐसा consider   किया जाता है  कि  जब  पिछला चरण complete   हो जाये  तब ही एक दूसरा  नया चरण प्रारम्भ किया जा सकता है | 
Classical water fall model में पिछले चरण का  जिसको complete  किया जा चूका है  उसका आउटपुट वर्तमान चरण का जिसमे कार्य किया जा रहा उसका  इनपुट होता है | 
अतः  Classical water fall model में  प्रोसेस को development  का   sequential  flow  माना जा सकता है |   Classical water fall model में कोई भी चरण    एक दूसरे को ओवरलैप नहीं करता है | 
Classical water fall model  के लाभ और हानि के लिए नीचे स्क्रॉल करे 
Advantage and Disadvantge  of  Classical water fall model =>

वाटरफॉल मॉडल एक झरने  की तरह काम करता है| अभी मै ये आपको  ग्राफ में

बताऊंगा
The product and the process, program vs software products, Emergence of software engineering, software development life cycle models, classical waterfall, iterative waterfall, prototyping, evolution, spiral & RAP model, comparison of various life cycle models, project management process, process management process.



 तो उसमें क्या होता है कोई भी क्लाइंट आपके पास आता है, और बोलता है

मेरे को सॉफ्टवेयर बनाना है | तो उसके लिए आप क्या करोगे पहले उस के क्या-क्या

रिक्वायरमेंट है| वह उससे ले लेंगे बाद में रिक्वायरमेंट एनालिसिस करोगे डायरेक्ट

सॉफ्टवेयर बनाने नहीं बैठ जाओगे, तो पहला Requirement एनालिसिस करोगे  और

फिर  रिक्वायरमेंट एनालिसिस खत्म होने के बाद, आप सिस्टम डिजाइन पर आओगे

मतलब सिस्टम को कैसे डिजाइन करना है, वह आपको पता चलेगा उसके बाद

इम्प्लीमेंटेशन  कैसे करना है टेस्टिंग कैसे करना है और डिप्लॉयमेंट कैसे करना है वह

पता चलेगा और Deployment  के बाद आपको सॉफ्टवेयर क्लाइंट को बताना होगा

और बाद में वह जो जैसा बोलते हैं वैसा उसको मेंटेनेंस करना पड़ेगा  |ये main

waterfall Model है | अभी वाटरफॉल मॉडल में स्पेशलिटी क्या है तो Requirement

एनालिसिस से आप सिस्टम डिजाइन पर आ गए तो सिस्टम डिजाइन से आप

रिक्वायरमेंट एनालिसिस पर नहीं जा सकते हो यह इसमें स्पेशलिटी है, इसीलिए हम

बोलते हैं कि यह झरने की तरह काम करता है |एक बार आप नीचे के फेस पर आ गए

तो ऊपर के फेस पर नहीं जा सकते हो एक बार यहां से नीचे आ गया तो आप ऊपर

नहीं जा सकते हो| ये main स्पेशलिटी है| waterfall Model मॉडल में क्या होता है कि

Human  हंड्रेड परसेंट फिक्स नहीं होता है कि यही हमको रिक्वायरमेंट है अगर उसको

कोई भी नहीं इंप्लीमेंटेशन करना है अगर आप उसकी कोई भी रिक्वायरमेंट चेंज हो गए

सिस्टम डिजाइन के बाद तो हम तो परफेक्ट है तो उसमें क्या करना पड़ेगा हमको

रिक्वायरमेंट एनालिसिस पर जाना पड़ेगा सिस्टम डिजाइन से ठीक है तो वाटरफॉल

मॉडल क्या प्रोवाइड करता है कि आप अगर सिस्टम डिजाइन पर हो तो रिक्वायरमेंट

एनालिसिस पर जा सकते हो लेकिन अगर आप इंप्लीमेंटेशन पर हो तो सिस्टम

रिक्वायरमेंट एनालिसिस में नहीं जा सकते यह मुख्य desadvantage  है |
स्पेशलिटी बोलो तो भी सही है|  मतलब आप पहले फेस पर हो तो दूसरे फेस पर जाओ

और दूसरे सबसे पहले पेज पर आ सकते हो पर अगर आप तीसरे भेजते हो तो पहले

पेज पर नहीं आ सकता हो ये Subsequent  जैसा होना चाहिए| तो अब तक आपको

waterfall model   का जो मेन कंसेप्ट को पता चल गया होगा

 अभी इसमें प्रश्न कैसे बनते है वो देख लेते है ?

1)When water fall model use ?(वाटरफॉल मॉडल का प्रयोग कब किया जाता है ?
 तो वह  वाटरफॉल मॉडल का   यूज़ तभी  होता है जब प्रोजेक्ट छोटे है तब use

होता है | मतलब अगर आपका प्रोजेक्ट बहुत बड़ा हुआ तो रिक्वायरमेंट एनालिसिस में

कोई भी सुधार आएगा ही आएगा क्योंकि आपका प्रोजेक्ट बड़ा है इसलिए वाटरफॉल

मॉडल वहां पर फेल हो जाता है ठीक है
2)What is specialty of WaterFall model (वॉटरफॉल मॉडल की स्पेशिलिटी क्या है 

?)
स्पेशलिटी ऑफ वाटरफॉल मॉडल स्पेशलिटी क्या है तो यह है कि अगर आप

रिक्वायरमेंट एनालिसिस से सिस्टम डिजाइन पर आएं तो सिस्टम डिजाइन से

रिक्वायरमेंट एनालिसिस पर नहीं आ सकते हो यह मैंन स्पेशलिटी है पर कई बार उस

में आना ही पड़ता है जैसे गवर्नमेंट रूल चेंज हो गए,या अगर फेसबुक   काम ले रहे हो

 तो वह भी  ऑडियो कॉलिंग है और वह बोलता है कि अभी मेरे को वीडियो कॉलिंग

भी करना है तो वह रिक्वायरमेंट एनालिसिस पर हम को आना ही पड़ेगा बाद में

सिस्टम डिजाइन में चेंजेस हो गए यह इसका उदाहरण  है

Waterfall model के प्रॉब्लम :


1)Specification is frozen early,because It is costly and time consuming
मतलब क्लाइंट का स्पेसिफिकेशन जो दिया होता है वो चेंज हो जाता है क्योकि उसको

चेंज करना पड़ता है अगर सोफ्टवेयर में तो concept चेंज हो जाता है | इसीलिए

हमको वापस जाना पड़ता है | तो उसमे क्या होता है की टाइम consuming हो जाता

है ,पूरा सॉफ्टवेयर का कोडिंग हमको देखना पड़ता है पूरे इंप्लीमेंटेशन देखना पड़ता है

यह मुख्य प्रॉब्लम है
2)Specification is frozen early,because Less possibity to get success
इसमें क्या होता है की क्लाइंट  कई बार आता है और चेंजेस देता है और हम को

करना पड़ता है अगर हम परफेक्ट है  तो भी  हम उसमें कुछ नहीं कर सकते तो यह

सक्सेस बहुत  नहीं है | इसीलिए ये स्मॉल प्रोजेक्ट में यूज होता है|

Waterfall Model के  Observations: 

1)Process stages can be iterative.
मतलब क्लाइंट बोलता है की हम को ये चेंजेस करना है तो हमारी प्रोसेस Iterative

method  में change हो जाती है
मतलब हमको रिक्वायरमेंट एनालिसिस सिस्टम डिजाइन पर गए थे फिर से

रिक्वायरमेंट एनालिसिस पर आ गये इसे Iterative method पर काम करना पड़ता है

2)Flexibility in coping with changing specification.
स्पेसिफिकेशन चेंज होने से हमको फ्लेक्सिबिलिटी करनी पड़ती है मतलब एक प्रोसेस से

दूसरी प्रोसेस में जाना पड़ता है तो आपको  पता चल गया होगा कि वाटरफॉल मॉडल

एक्चुअल है क्या और उसका concept क्या है

तो आइये सॉर्ट में फिर से रिवाइज कर ले =>
वाटरफॉल मॉडल झरने की तरह काम करता है उसमें एक प्रोसेस से दूसरी प्रोसेस पर

आए तो दूसरी प्रोसेस से पहले प्रोसेस पर जाना नहीं पड़ता ये इसका मुख्य concept है
| और वाटरफॉल मॉडल में ह्यूमन बिहेवियर 99% होता है सो अगर क्लाइंट की

रिक्वायरमेंट हुए तो हम को वापस जाना पड़ता है|
पर वो subsequent दो stages में ही जाना पड़ता है  मतलब अगर आप दुसरे stage

में आये तो पहले स्टेज पर  आ सकते हो| पर तीसरे से पहले स्टेज पर नहीं आ सकते

हो|
\

क्लासिक वॉटरफॉल मॉडल  के  लाभ 
जैसे किस आप Classical water fall model  के  इसी पोस्ट में पढ़ चुके है की यह मॉडल idealistic , simple  और अन्य मॉडल के लिए बेसिक है इसलिए इसी के आधार पर इस मॉडल के आइये  advantages  देख लेते है

  1. Classical water fall model  समझने कि दृष्टि से बहुत ही आसान व सिंपल  Classical water fall model  (SDLC ) है 
  2.  Classical water fall model  में एक समय  केवल चरण प्रोसेस्ड  किया जा सकता है |  ऐसा क्यों आप इसी पोस्ट में ऊपर पढ़ सकते है | ताकि misunderstanding  न हो 
  3. Classical water fall model  में प्रक्रिया ,action ,और परिणाम बहुत अच्छी तरह से documented  होते है | 
  4. Classical water fall model  छोटे प्रोजेक्ट में बहुत अच्छी तरह से कार्य करता है साथ ही जहां आवशयकता  को अच्छे से समझ लिया जा सके | 
  5. Classical water fall model  में प्रत्येक चरण बहुत अच्छी तरह से परिभाषित होते है | 
  6. यह अच्छी आदते विकसित  करने में मदद  है जैसे की  डिज़ाइन के पहले परिभाषित करना या  कोडिंग से पहले  डिज़ाइन करना | 
  7. Classical water fall model  में प्रत्येक चरण को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाता है 

क्लासिक वॉटरफॉल मॉडल  के  हानि =>
Classical water fall model  में कई कमियां  जैसे की अपने पोस्ट पढ़ा होगा तो  मोटा मोटा समझ में आ गया होगा |  तो चलिए इसकी कमियों को उजागर करते है 
  1. क्लासिक वॉटरफॉल मॉडल  में सॉफ्टवेर का विकास एक चरण से दूसरे चरण में झरने के सामान होता है , Classical water fall model में यह मान के चलना पड़ता है कि डेवलपर द्वारा किसी भी चरण में कोई भी error नही होगी | अतः Classical water fall model कोई भी mechanism ,error correction के लिए नही प्रदान करता है |
  2. इस मॉडल में यह मान के चला जाता है की कस्टमर कि जो भी आवश्यकता है उसे  प्रोजेक्ट के प्रारम्भ में ही पूरा और सही परिभाषित किया जा सकता है |  लेकिन आप को भी रियल लाइफ में देखने को मिलता है कि कस्टमर की requirements कभी भी ख़त्म नहीं हो सकती अगर उसे आज के कम्पटीशन भरे दौर में बने रहना है तो अतः कस्टमर की आवश्यकता समय के साथ बदलती रहती    है |  और जैसे की आपको पता है कि  क्लासिकल वाटरफाल मॉडल में किसी भी फेज के पूरा होने के बाद उसमे बदलाव करना डिफिकल्ट होता है ,  अतः requirements  specification  चरण पूर्ण होने के बाद किसी भी चेंज request  को accommodate (सुनियोजित) करना बहुत ही डिफिकल्ट है 
  3. यह मॉडल इस बात की बात की सिफारिश करता है कि  नया चरण तभी प्रारम्भ हो सकता है जब पिछले चरण पूर्ण हो जाये|  लेकिन आपको भी पता है कि वास्तविक प्रोजेक्ट में ऐसा maintend कर पाना आसान नहीं है | अतः कुशलता को बढ़ाने और खर्च को कम  करने के लिए चरण overlap  हो सकते है |आपको हमारा ये पोस्ट कैसा लगा कृपया नीचे कमेंट सेक्शन में बताएं ताकि और पोस्ट लाई जा सकते



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